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Thursday, February 25, 2010

होली का सन्देश

aaj utha lo pichkari,
rang do tan man rangbhed mite.
bahut ho chuka dharm jat pe maramari,
sang do sathi ki aaj hamari holi ka sandesh Jite.

aayo pran le hum ki khun ki holi ab nhi hone denge,
ab na bachpan royega na maa ko beta khone denge.
ab na chudi tutegi kabhi kisi suhagan ki,
ab na tulsi sukhegi kabhi kisi ke angan ki.
hindu, muslim, sikh,ishayi sab rango ko aaj milana hai,
manvata ki muh ki kalikh aaj esi se mitana hai.

aatank ke aage sir jhukana hamara usul nhi,
pagalo ki toli ki ye khuni holi hame qubul nhi.
siyasi chal chalte hai jo log desh ko bat kar,
aao sathi ab bahut ho chuka, rakh de unko kat kar.
koi deemak es desh ko chate, hum etne bhi mazbur nhi,
ye HINDUSTA hum charo ka hai,kya espe tumhe gurur nhi.

ab to sambhlo media walo, ab to apni pachan karo,
desh ke chaturth stambh tum,
abhay ho desh jodne wala kam karo.
khub batori TRP tum sabne, 26/11 ke live telecast par,
bewakufo ki tarah dikha rhe the pal pal ki tum har khabar.
arey dhurandharo ban chuke the dushmano ki ankh tum,
kya tum ko sharm nhi aati jo karte ho roj bakwas tum.
Bahut dikha chuke media walo tum kasab ke kartab ko,
ab to koi prasaran ho jisame Iswar-Allah ka sandesh dikhe.
sang do sathi ki aaj hamari holi ka sandesh Jite......

Saturday, December 19, 2009

विभाजन

विभक्त है समाज आज,
मान्यताओ की लकीरों से.
वसुधा के वक्ष पे भी सीमाए हज़ार है.

परमात्मा प्रदत प्रेममय आत्मा से भी,
हाय, हम विभक्त होकर,
दानवता से आशक्त होकर,
अखिल प्रकृति को नष्ट भ्रष्ट करने को तैयार है.

सोचिये..इन दुश्प्रविर्तियो का,
मूल तो विभाजन है.
खंडित देख काल को अनेक वर्षखंडो में,
सोचता हू, प्रादुर्भूत हो,
इसका क्या प्रयोजन है.

वह कौन है?

इस अनंत अंध में, दुर्गन्ध में,
तमस की तामसिकता से डरा हुआ सा,
वो कौन है जो लग रहा है मानव सा.
डोल रहा है पवन के हिलकोरे से,
झींगुरों से, मेंढको से, आ रही ध्वनि तरंगो से;
वह कौन है? तम में लिपटा हुआ निष्तेज सूखे पत्ते सा.
पथहीनता, ओजहीनता, अकर्मण्यता का दारुण दंश,
जो कदाचित अधिक है, शरसैयाशयन से भी,
मानवसहनशक्ति से परे दंशो का,
वह कौन है? जो कर रहा आकंठपान ठीक नीलकंठ सा.
सहनशीलता की आपारशक्ति संपन्न होकर,
क्या हुआ कि आज ये विपन्न होकर,
सिसक रहा है जगत से भिन्न होकर,
वो कौन है? आत्मबलहीन मानव सा.
तम की दृष्टि से निहारने पर,
तमस में कुछ क्षण विहारने पर,
द्रष्टव्य हो रही है और भी आकृतिया,
ये सब क्या है? जो प्रतीत हो रहा आतंक सा.

जो भी हो, उन्हें क्या जो किरणों के रथी है,
छोड़ देंगी साथ जहा उनकी प्रभा प्रभाकर की,
पौरष के प्रकाश में गतिमान ही रहेगे वे,
असंभव है कि पथ रोक पाए उनका कोई,
अँधेरा सा.

श्रीजनवेला

उस श्रीजन काल में जब,
श्रीजित हुआ था मानव।
सहम गया था, थम गया था,
तृष्णा से भर गया था।
अरे विधाता ने मुझे क्या दिया है,
तीक्ष्णता नही नख दन्तो में,
नहीं मुझमे नही वो भौतिक बल,
की जग में जाकर लड़ सकू,
अपना जीवनयापन कर सकू।
चीत्कार उठा वो मन ही मन, यह अत्याचार क्यों है,
इस अखिल विश्व में मानव असहाय क्यों है।
उद्वेलित हो उठा वो शक्तिपुंज,
अनंत में व्याप्त हुई, एक व्याकुल सी गूंज,
मानव ? क्या तू सो रहा है,
श्रीजनवेला से ही तू क्यों दिग्भ्रमित हो रहा है।

प्रथम बार एवं अंतिम बार मै तुझको स्मरण कराता हूँ।
मानव क्या है ? मानव शक्ति क्या है?
तुझको आज बताता हूँ ॥
तू उर्वर मस्तिष्क का धारक है ;
तुझमे है वो इच्छाशक्ति, जिसके बल पे तू जग को क्या,
जीत सकता है मुझको भी।

क्रीडाक्षेत्र स्वरुप मैंने तुमको भावनाओ का जाल दिया है।
परमानन्द एवं मुक्ति हेतू, एक नैसर्गिक भाव 'प्यार' दिया है॥
स्मरण रहे, पशुता का भाव भी है तुझमे,
जबतक विजयी रहा इसपर,
तबतक ब्रम्हांडपति कहलायेगा;
जिस दिन तेरी हर हुई,
पशुता तुझपर सवार हुई,
उस दिन अवनति पायेगा।
एक सर्वहारा पशु की तरह,
गर्त में पशुवत जीवन बिताएगा॥

Friday, December 18, 2009

जो भी है बस यही एक पल है.

ये कालचक्र है,
गतिमान है,
अनुशाहित है।
अनुसरण करता है यह जिसका,
कुछ नियम है,
अपरिभाषित है।
यह वह भूमि भी है,
जिसमे हम बोकर वर्तमान के बीज,
काटते है भविष्य की फसल।
यदि पोषित करे वर्तमान को,
मधुर भविष्य का फल होगा।
जो भी है बस यही एक पल है,
सोचिये मत, क्या कल होगा।

Thursday, July 16, 2009

कुछ चीजे कभी नही बदलती


जीवन में सबको सबकुछ तो नही मिल जाता।
आते है हजार बीज धरती के आगोश में, पर सबसे अंकुर तो नही निकल आता।
अश्रुपूरित नजरो से देखती हिरनी को देख, हर एक शिकारी का हृदय तो नही पिघल जाता।
घृणा द्वेष की राह की, मंजील तो बर्बादी है, फ़िर भी चलता हर इन्सान, संभल तो नही जाता।
अक्सर निःस्वार्थ प्रेम को, ना लोग समझ पाते है।
हाथ पकरने पर रेत की तरह, उंगलियों की कोरो से निकल जाते है।
फ़िर भी रहता है मौजूद दिल में ये प्यार तो नही बदल जाता।
शायद हममे भी वो बंधन था, जो कण-कण मे चट्टान के।
आज बिखरे रेत है हम, दुनिया के रेगिस्तान के।
बिखर गए तो क्या, इन्सान तो नही बदल जाता।
कहने को बहुत सी बातें है, शायद मै कह जाता।
केवल कहने सुनने से लेकिन, हालात तो नही बदल जाता।

Saturday, July 11, 2009

टूटे तारो का धुन..

मन में बहुत सी बाते घुमती है।
कुछ बहती है बनके लावा तो कुछ अंतर्मन को चूमती है।
एकांत में, रात में, होता है इनका कोलाहल कोई नीरजस्पर्श लगे, तो कोई लगे हलाहल।

सपनों के अभूझ जालो में क्यों मनुज मन खोता है।
ईश्वर की अद्भुत रचना, मनुज क्यों रोता है।
कोई भ्रमर सा अनल में अपने सपनों को झुलसा कर।
चीरआनंद में अडीग खड़ा, दोनों हाथो को फैला कर।

माना वीणा की अनटूटे तार अद्भुत स्वर झनकाते है ।
मानव मन को झंकृत कर, भौतिक भाव जगा जाते है।
पर टूटे तारो से भी एक मधुर धुन आता है,
अन्तः का अनुगूँज है वह धुन , मानवता की परिभाषा है।
बातो के कोलाहल में छुप रहा टूटे तारो का धुन,
शब्दों के हलाहल में विलुप्त हो रहा वो अनुगूँज।
कदाचित इसी प्रयोजन से मथनी बना था मंदिरांचल,
सिन्धु वक्ष मंथित कर उत्पन्न हुआ पियूष और हलाहल।

है पियूष झंकार वीणा की अनटूटे तारो का।
हलाहल है प्रवेश द्वार अन्तः के गलियारों का।
फ़िर क्यों ना करे आकंठ पान इसका ठीक नीलकंठ सा,
स्वप्न सिन्धु के पार अन्तः की राह बताये हलाहल....