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Thursday, July 16, 2009

कुछ चीजे कभी नही बदलती


जीवन में सबको सबकुछ तो नही मिल जाता।
आते है हजार बीज धरती के आगोश में, पर सबसे अंकुर तो नही निकल आता।
अश्रुपूरित नजरो से देखती हिरनी को देख, हर एक शिकारी का हृदय तो नही पिघल जाता।
घृणा द्वेष की राह की, मंजील तो बर्बादी है, फ़िर भी चलता हर इन्सान, संभल तो नही जाता।
अक्सर निःस्वार्थ प्रेम को, ना लोग समझ पाते है।
हाथ पकरने पर रेत की तरह, उंगलियों की कोरो से निकल जाते है।
फ़िर भी रहता है मौजूद दिल में ये प्यार तो नही बदल जाता।
शायद हममे भी वो बंधन था, जो कण-कण मे चट्टान के।
आज बिखरे रेत है हम, दुनिया के रेगिस्तान के।
बिखर गए तो क्या, इन्सान तो नही बदल जाता।
कहने को बहुत सी बातें है, शायद मै कह जाता।
केवल कहने सुनने से लेकिन, हालात तो नही बदल जाता।

Saturday, July 11, 2009

टूटे तारो का धुन..

मन में बहुत सी बाते घुमती है।
कुछ बहती है बनके लावा तो कुछ अंतर्मन को चूमती है।
एकांत में, रात में, होता है इनका कोलाहल कोई नीरजस्पर्श लगे, तो कोई लगे हलाहल।

सपनों के अभूझ जालो में क्यों मनुज मन खोता है।
ईश्वर की अद्भुत रचना, मनुज क्यों रोता है।
कोई भ्रमर सा अनल में अपने सपनों को झुलसा कर।
चीरआनंद में अडीग खड़ा, दोनों हाथो को फैला कर।

माना वीणा की अनटूटे तार अद्भुत स्वर झनकाते है ।
मानव मन को झंकृत कर, भौतिक भाव जगा जाते है।
पर टूटे तारो से भी एक मधुर धुन आता है,
अन्तः का अनुगूँज है वह धुन , मानवता की परिभाषा है।
बातो के कोलाहल में छुप रहा टूटे तारो का धुन,
शब्दों के हलाहल में विलुप्त हो रहा वो अनुगूँज।
कदाचित इसी प्रयोजन से मथनी बना था मंदिरांचल,
सिन्धु वक्ष मंथित कर उत्पन्न हुआ पियूष और हलाहल।

है पियूष झंकार वीणा की अनटूटे तारो का।
हलाहल है प्रवेश द्वार अन्तः के गलियारों का।
फ़िर क्यों ना करे आकंठ पान इसका ठीक नीलकंठ सा,
स्वप्न सिन्धु के पार अन्तः की राह बताये हलाहल....