मन में बहुत सी बाते घुमती है।कुछ बहती है बनके लावा तो कुछ अंतर्मन को चूमती है।
एकांत में, रात में, होता है इनका कोलाहल कोई नीरजस्पर्श लगे, तो कोई लगे हलाहल।
सपनों के अभूझ जालो में क्यों मनुज मन खोता है।
ईश्वर की अद्भुत रचना, मनुज क्यों रोता है।
कोई भ्रमर सा अनल में अपने सपनों को झुलसा कर।
चीरआनंद में अडीग खड़ा, दोनों हाथो को फैला कर।
माना वीणा की अनटूटे तार अद्भुत स्वर झनकाते है ।
मानव मन को झंकृत कर, भौतिक भाव जगा जाते है।
पर टूटे तारो से भी एक मधुर धुन आता है,
अन्तः का अनुगूँज है वह धुन , मानवता की परिभाषा है।
बातो के कोलाहल में छुप रहा टूटे तारो का धुन,
शब्दों के हलाहल में विलुप्त हो रहा वो अनुगूँज।
कदाचित इसी प्रयोजन से मथनी बना था मंदिरांचल,
सिन्धु वक्ष मंथित कर उत्पन्न हुआ पियूष और हलाहल।
है पियूष झंकार वीणा की अनटूटे तारो का।
हलाहल है प्रवेश द्वार अन्तः के गलियारों का।
फ़िर क्यों ना करे आकंठ पान इसका ठीक नीलकंठ सा,
स्वप्न सिन्धु के पार अन्तः की राह बताये हलाहल....


4 comments:
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Thanks buddy for these inspiring words.
i like this ..........this is the best from my opinion .....flawless and smooth with amicable meaning
Thanks a lot Sonal..
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