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Saturday, December 19, 2009

श्रीजनवेला

उस श्रीजन काल में जब,
श्रीजित हुआ था मानव।
सहम गया था, थम गया था,
तृष्णा से भर गया था।
अरे विधाता ने मुझे क्या दिया है,
तीक्ष्णता नही नख दन्तो में,
नहीं मुझमे नही वो भौतिक बल,
की जग में जाकर लड़ सकू,
अपना जीवनयापन कर सकू।
चीत्कार उठा वो मन ही मन, यह अत्याचार क्यों है,
इस अखिल विश्व में मानव असहाय क्यों है।
उद्वेलित हो उठा वो शक्तिपुंज,
अनंत में व्याप्त हुई, एक व्याकुल सी गूंज,
मानव ? क्या तू सो रहा है,
श्रीजनवेला से ही तू क्यों दिग्भ्रमित हो रहा है।

प्रथम बार एवं अंतिम बार मै तुझको स्मरण कराता हूँ।
मानव क्या है ? मानव शक्ति क्या है?
तुझको आज बताता हूँ ॥
तू उर्वर मस्तिष्क का धारक है ;
तुझमे है वो इच्छाशक्ति, जिसके बल पे तू जग को क्या,
जीत सकता है मुझको भी।

क्रीडाक्षेत्र स्वरुप मैंने तुमको भावनाओ का जाल दिया है।
परमानन्द एवं मुक्ति हेतू, एक नैसर्गिक भाव 'प्यार' दिया है॥
स्मरण रहे, पशुता का भाव भी है तुझमे,
जबतक विजयी रहा इसपर,
तबतक ब्रम्हांडपति कहलायेगा;
जिस दिन तेरी हर हुई,
पशुता तुझपर सवार हुई,
उस दिन अवनति पायेगा।
एक सर्वहारा पशु की तरह,
गर्त में पशुवत जीवन बिताएगा॥

2 comments:

Abhay said...
This comment has been removed by the author.
Abhay said...

Due to writing script limitations, i am not able to spell some words in correct way..so all of you who love hindi literature please forgive me...