इस अनंत अंध में, दुर्गन्ध में,
तमस की तामसिकता से डरा हुआ सा,
वो कौन है जो लग रहा है मानव सा.
डोल रहा है पवन के हिलकोरे से,
झींगुरों से, मेंढको से, आ रही ध्वनि तरंगो से;
वह कौन है? तम में लिपटा हुआ निष्तेज सूखे पत्ते सा.
पथहीनता, ओजहीनता, अकर्मण्यता का दारुण दंश,
जो कदाचित अधिक है, शरसैयाशयन से भी,
मानवसहनशक्ति से परे दंशो का,
वह कौन है? जो कर रहा आकंठपान ठीक नीलकंठ सा.
सहनशीलता की आपारशक्ति संपन्न होकर,
क्या हुआ कि आज ये विपन्न होकर,
सिसक रहा है जगत से भिन्न होकर,
वो कौन है? आत्मबलहीन मानव सा.
तम की दृष्टि से निहारने पर,
तमस में कुछ क्षण विहारने पर,
द्रष्टव्य हो रही है और भी आकृतिया,
ये सब क्या है? जो प्रतीत हो रहा आतंक सा.
जो भी हो, उन्हें क्या जो किरणों के रथी है,
छोड़ देंगी साथ जहा उनकी प्रभा प्रभाकर की,
पौरष के प्रकाश में गतिमान ही रहेगे वे,
असंभव है कि पथ रोक पाए उनका कोई,
अँधेरा सा.
Saturday, December 19, 2009
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2 comments:
if i comment in one word ..."touching "....kavita me jadoo hoti hai ... ye kisi k dil ko kaise chuu leti hai kisi ko pata nahi , kavitayeen mitra ban jati hain , honsla deti hai , motivate karti hai ... bhawnao ko vyakt karti hain ...yadi hum apni kisi manpasand kavita ki do-char pankitiyaan bhul jate hai to aisi chatpatahat hoti hai jaise kisi purane mitra se dur jane par hoti hai ..... maine aaj kuchh naye mitra bana liye hain ......
It will be an honor for me, that one of my poem is friend of my friend...:)
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